बिलासपुर 18 अक्टूबर 2026।बिलासपुर राजनीति भी गजब का खेल है। कुर्सी मिले तो जनसेवा का जुनून और चुनाव में जनता का फैसला विपरीत आ जाए तो सियासी ठिकाने की तलाश! बेलतरा की राजनीति में इन दिनों एक ऐसे ही नेताजी की गतिविधियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। चुनावी नतीजों के बाद कोटा में राजनीतिक जमीन तलाशने की खबरों के बीच नेताजी अब फिर बेलतरा की तरफ रुख करते दिखाई दे रहे हैं। इसे सियासी वापसी कहें या अगले चुनाव के लिए नई बिसात बिछाने की तैयारी, फिलहाल सवाल कई हैं और जवाब का इंतजार है।
पार्षद की कुर्सी से विधानसभा के सपने तक
नेताजी का राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा, कभी निगम क्षेत्र में पार्षद बनकर राजनीति की पारी शुरू की, फिर विधानसभा की राजनीति में बड़े सपने देखने लगे, कोटा में सियासी संभावनाएं तलाशीं, लेकिन वहां भी समीकरण मनमाफिक नहीं बैठे,आखिरकार बेलतरा की ओर लौटने की सुगबुगाहट शुरू हो गई, अब सवाल यह है कि नेताजी का दिल आखिर किस विधानसभा क्षेत्र में बसता है? जहां संभावना दिखे, वहीं सियासी डेरा डालने की यह कला राजनीति में नई नहीं है, लेकिन जनता भी अब पुराने चेहरों के नए दावों का हिसाब रखने लगी है।
हार का आंकड़ा बना चर्चा का विषय
नेताजी की चुनावी हार को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में खूब चर्चाएं हैं। सूत्रों के दावों पर भरोसा करें तो हार का अंतर इतना बड़ा बताया जा रहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद बेलतरा में चुनाव हारे प्रत्याशियों के हार के अंतर को जोड़ने पर भी यह आंकड़ा भारी पड़ सकता है। बताया जाता है कि इतना जरूर है कि चुनावी नतीजे को महज हार मानकर भूल जाना आसान नहीं होगा,जनता ने मतदान के जरिए जो संदेश दिया, उसका अर्थ समझना नेताजी के लिए किसी राजनीतिक पाठशाला से कम नहीं होगा।
जनसेवा या चुनावी मौसम की आहट?
अब नेताजी की सक्रियता बढ़ती है तो सवाल उठना लाजिमी है। क्या उन्हें अचानक जनता की याद आने लगी है या फिर आगामी चुनावों का मौसम अभी से महसूस होने लगा है? राजनीति में जनसंपर्क कभी भी शुरू किया जा सकता है, लेकिन जनता का भरोसा केवल चुनाव के आसपास दिखाई देने से नहीं मिलता। इसके लिए लगातार मौजूदगी, काम और जवाबदेही भी जरूरी है। फिलहाल बेलतरा में नेताजी की वापसी की चर्चाएं जरूर हैं। मगर सियासत में पुराने चेहरे की वापसी और जनता के दिल में दोबारा जगह बनाने के बीच लंबा फासला होता है। अब देखना होगा कि नेताजी इस बार केवल राजनीतिक गलियारों में हलचल मचाते हैं या जमीनी स्तर पर भी कुछ नया कर दिखाते हैं। आखिरकार, राजनीति में ठिकाना बदलना आसान है, लेकिन मतदाताओं का भरोसा दोबारा जीतना इतना आसान नहीं!
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