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पिता के संस्कार से राजनीति की पाठशाला तक पहुंचे अमर अग्रवाल, बोले,‘जो नहीं आता, उसे सीखना ही मेरा जुनून’...

बिलासपुर 23 अगस्त 2026।बिलासपुर पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं बिलासपुर विधायक अमर अग्रवाल ने रविवार को बिलासपुर प्रेस क्लब के पारंपरिक कार्यक्रम ‘हमर पहुना’ में अपने बचपन से लेकर राजनीतिक सफर और प्रशासनिक अनुभवों तक कई पहलुओं पर खुलकर बातचीत की, प्रेस क्लब अध्यक्ष अजित मिश्रा, उपाध्यक्ष विजय क्रांति तिवारी, सचिव संदीप करिहार और सह-सचिव हरिकिशन गंगवानी ने उनका साल-श्री भेंट कर स्वागत किया और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया,
अमर अग्रवाल ने अपने राजनीतिक जीवन की सफलता का सबसे बड़ा श्रेय अपने पिता स्व. लखीराम अग्रवाल को दिया। उन्होंने कहा कि पिता उनके सबसे बड़े मार्गदर्शक रहे,अविभाजित मध्यप्रदेश में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य रहे लखीराम अग्रवाल के राजनीतिक जीवन को करीब से देखते हुए ही उन्हें संगठन और जनसेवा के संस्कार मिले, बचपन में सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी, कुशाभाऊ ठाकरे और राजमाता सिंधिया जैसे नेताओं को करीब से देखने-सुनने का अवसर भी मिला,22 सितंबर 1963 को खरसिया में जन्मे अमर अग्रवाल का सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें राजनीति की राह पर ला खड़ा किया,वर्ष 1996 में युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष बनने के बाद 1998 में पहली बार बिलासपुर विधानसभा से चुनाव लड़ा, वर्ष 2003 में विधायक बनने के बाद उन्हें मंत्री पद की जिम्मेदारी मिली और 2003 से 2018 तक विभिन्न विभागों में काम करने का अवसर मिला,मंत्री पद के शुरुआती अनुभव साझा करते हुए उन्होंने बताया कि पहली फाइल की प्रक्रिया समझने के बाद उन्होंने प्रशासनिक कामकाज को गहराई से सीखने का संकल्प लिया, रोज अध्ययन करते हुए उन्होंने विभागीय कार्यप्रणाली समझी और बाद में कम समय में बड़ी संख्या में फाइलों के निपटारे की क्षमता विकसित की,उन्होंने कहा, “जो नहीं आता, उसे सीखना चाहिए। सीखने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।”
स्वास्थ्य मंत्री के कार्यकाल का उल्लेख करते हुए उन्होंने 108 संजीवनी एक्सप्रेस और 102 महतारी एक्सप्रेस जैसी सेवाओं की शुरुआत से जुड़े अनुभव साझा किए, उन्होंने कहा कि विदेशों में स्वास्थ्य मॉडल का अध्ययन करने से आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा मिली,अरपा नदी को लेकर उन्होंने कहा कि नदी के मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ हुई है और पानी रोकने की चुनौती अब भी बनी हुई है। बिलासपुर के 30 साल के मास्टरप्लान पर उन्होंने उम्मीद जताई कि आने वाले पांच वर्षों में इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई देंगे,कार्यक्रम के दौरान उन्होंने अपने खान-पान और निजी पसंद भी साझा की,उन्होंने खुद को पूरी तरह शाकाहारी बताते हुए सादा भोजन के साथ बिलासपुर की भजिया-चटनी पसंद होने की बात कही। ‘हमर पहुना’ में उनका संवाद राजनीतिक उपलब्धियों से आगे बढ़कर संस्कार, सीखने की आदत, समय प्रबंधन और जनसेवा के अनुभवों तक पहुंचा है।

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