बिलासपुर, 21 अप्रैल 2026।पुलिस विभाग का नियम कहता है,एक पुलिसकर्मी तीन साल से ज्यादा एक ही थाने में नहीं रहेगा, लेकिन बिलासपुर में यह नियम अब शायद प्रेरणादायक पोस्टर की तरह दीवारों तक सीमित हो गया है। ज़मीनी हकीकत यह है कि कुछ वर्दीधारी इस नियम को पढ़कर मुस्कुरा देते हैं और फिर आराम से उसी कुर्सी पर बैठ जाते हैं, जहां सालों पहले बैठे थे।
सूत्र बताते हैं कि कई पुलिसकर्मी तीन साल तो क्या, उससे भी ज्यादा समय से एक ही थाने में “स्थायी सदस्य” बने हुए हैं। हालात ऐसे हैं कि ट्रांसफर आदेश उनके लिए महज एक औपचारिकता बन गया है,आदेश निकलता है, चर्चा होती है, और फिर कुछ दिनों बाद वही चेहरे उसी थाने में फिर से दिखाई देते हैं। कुछ मामलों में तो स्थिति और दिलचस्प है,तबादला महीनों पहले हो चुका, लेकिन जनाब आज भी उसी थाने में “सेवा” दे रहे हैं। इसे देखकर ऐसा लगता है कि आदेश ऊपर से आता जरूर है, लेकिन रास्ते में कहीं “प्रभाव” की दीवार से टकराकर दम तोड़ देता है।
अब सवाल उठता है,आखिर इन कर्मियों में ऐसा क्या खास है? क्या ये थाने के ऐसे “अनमोल रत्न” हैं जिनके बिना व्यवस्था चल ही नहीं सकती? या फिर इनकी पहुंच इतनी मजबूत है कि आदेश भी सलाम ठोककर लौट जाता है? चर्चा तो यहां तक है कि थाना क्षेत्र की हर गतिविधि,चाहे प्रशासनिक हो या राजनीतिक,इनके इर्द-गिर्द ही घूमती है।
विडंबना यह भी है कि जहां ये “स्थायी” कर्मी तैनात हैं, वहीं जुआ और नशे का कारोबार भी बेखौफ चल रहा है। कार्रवाई का हाल कुछ ऐसा है मानो “देखो, समझो और आगे बढ़ो” नीति लागू हो, वही लोग सवाल करे तो जवाब में खामोशी मिलती है, और फाइलें शायद अपने ही बोझ से दबी पड़ी रहती हैं।
अब यह समझना मुश्किल है कि तीन साल वाला नियम सिर्फ नए पुलिसकर्मियों के लिए है या कुछ खास लोगों के लिए “विशेष छूट” का प्रावधान भी है। फिलहाल इंतजार इस बात का है,कि आखिर कब इस ‘अटल सेवा’ पर भी उच्च अधिकारियों की नजर पड़ेगी, या फिर यह रिकॉर्ड यूं ही बनता रहेगा।
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