Ticker

6/recent/ticker-posts

Header Ads Widget

Responsive Advertisement

बिलासपुर की सियासत में ‘जनसेवा या चुनावी एक्टिंग’? चाय की दुकानों पर नेताजी के चर्चे,पानी की बौछार से नहीं डिगे नेताजी के कदम...

बिलासपुर 15 अक्टूबर 2026।बिलासपुर न्यायधानी की राजनीति इन दिनों एक अलग ही रंग में नजर आ रही है। जनता की सेवा के दावे, वादों की लंबी फेहरिस्त और चुनावी मौसम में अचानक बढ़ती सक्रियता ने सियासी गलियारों में चर्चाओं को हवा दे दी है। सवाल यह है कि राजनीति वास्तव में जनसेवा का माध्यम है या फिर जनता की आंखों में उम्मीदों का पर्दा डालकर कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता? कहावत है कि चुनाव के समय नेता जनता के लिए वादों की ऐसी पोटली खोलते हैं कि हर समस्या का समाधान बस कुछ ही कदम दूर दिखाई देने लगता है। कोई विकास की कसम खाता है, तो कोई हर सुख-दुख में साथ निभाने का भरोसा दिलाता है। लेकिन सत्ता की बारी आते ही कई वादे ऐसे गायब हो जाते हैं, मानो गंजे के सिर से बाल! फिर जनता पुराने वादों को ढूंढती रहती है और नेताजी नए राजनीतिक समीकरण बनाने में जुट जाते हैं।

इन दिनों बिलासपुर में नेताजी की सक्रियता को लेकर चाय की दुकानों पर खूब चर्चा हो रही है। चाय की चुस्कियों के बीच सज्जन कहते सुनाई देते हैं, “मानना पड़ेगा नेताजी को! तबीयत खराब होने की चर्चा के बावजूद मैदान में डटे रहे। न पानी की बौछार का असर और न प्रशासनिक सख्ती की परवाह। लगता है जनता की भलाई का जुनून सिर चढ़कर बोल रहा है!”

इतने में दूसरा चाय का कप रखते हुए तपाक से बोलता है, “अरे भाई, जनसेवा का जुनून अच्छी बात है, लेकिन यह जोश पूरे पांच साल क्यों नहीं दिखाई देता? चुनाव नजदीक आते ही जनता की याद इतनी तेज कैसे आ जाती है?” बस, फिर क्या था! चाय ठंडी होती रही और राजनीतिक बहस गर्म। कुछ लोगों ने व्यंग्य कसते हुए कहा कि नेताजी की अभिनय कला ऐसी ही रही, तो उन्हें राजनीति छोड़कर मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमानी चाहिए,वहां भी शायद कोई दमदार किरदार मिल जाए!

इसी बीच, मीडिया के सामने आने और बाइट दिलाने को लेकर भी चर्चाएं हैं। कुछ लोगों का दावा है कि नेताजी मीडिया से अपनी बात दिखाने के लिए आग्रह कर रहे थे और बाद में मिलने की बात कह रहे थे। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। सवाल यह है कि क्या राजनीति में जनता के मुद्दे प्राथमिकता हैं या फिर कैमरे पर दिखाई देना?

अब चर्चा पार्टी के टिकट को लेकर भी है। पिछली चुनावी हार के बाद नेताजी को दोबारा मौका मिलेगा या नहीं, यह पार्टी का फैसला होगा। लेकिन टिकट मिलने से पहले ही जनता के बीच उनकी सक्रियता और पुराने वादों का हिसाब चर्चा का विषय बन चुका है।

बहरहाल, नेताजी की तबीयत पर अटकलें लगाने के बजाय उनके काम और जनसेवा के रिकॉर्ड पर सवाल होना चाहिए,लोकतंत्र में अभिनय से तालियां मिल सकती हैं, लेकिन भरोसा काम से बनता है। अब देखना यह है कि जनता नेताजी के दावों पर भरोसा करती है या उनसे पूछती है,‘साहब, कैमरे के सामने तो खूब नजर आए, अब बताइए हमारे लिए किया क्या?’

Post a Comment

0 Comments