बिलासपुर 06 नवंबर 2026।बिलासपुर कोटा थाने में इन दिनों कानून की धाराओं से ज्यादा लक्ष्मी की धाराओं की चर्चा गर्म है। इलाके में अवैध शराब और नशे के कारोबार को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। होटलों और ढाबों में देर रात तक शराबखोरी और बिक्री की शिकायतें हैं, लेकिन कार्रवाई कितनी हो रही है, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। उधर, थाने के साहब की कार्यशैली को लेकर विभागीय गलियारों में जो चर्चाएं हैं, वे पुलिस महकमे की साख के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं हैं।
साहब का दरबार और चढ़ावे का कथित कारोबार!
विभागीय सूत्रों के दावों पर गौर करें तो कोटा थाने में कथित तौर पर काम की प्राथमिकता नियम-कानून नहीं, बल्कि आर्थिक हैसियत से तय होने की बातें कही जा रही हैं। आरोप हैं कि चढ़ावे का वजन भारी हो तो कार्रवाई की दिशा भी बदल सकती है। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल जरूर उठ रहे हैं कि आखिर अवैध कारोबारियों के हौसले इतने बुलंद कैसे हैं?
शाम होते ही सुरा की चर्चा, कानून की जिम्मेदारी किसके हवाले?
साहब को लेकर विभाग के कुछ सूत्रों ने शराब सेवन से जुड़े गंभीर आरोप भी लगाए हैं। चर्चाएं हैं कि शाम ढलते ही साहब का मिजाज बदलने लगता है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल व्यक्तिगत आचरण का मामला नहीं, बल्कि पुलिस अनुशासन और जिम्मेदारी से जुड़ा गंभीर विषय है। जिस अधिकारी के कंधों पर क्षेत्र की कानून व्यवस्था का भार हो, उसकी कार्यशैली ही सवालों में आ जाए तो जनता भरोसा किस पर करे?
FIR का भी कथित रेट कार्ड?
सबसे गंभीर आरोप यह है कि थाने में कथित आर्थिक लेन-देन के आधार पर किसी के पक्ष में कार्रवाई और किसी के खिलाफ मामला दर्ज कराने की चर्चाएं हैं। क्या वास्तव में कानून की किताब से पहले जेब का वजन देखा जा रहा है? यदि ऐसा है तो निष्पक्ष पुलिसिंग की अवधारणा पर इससे बड़ा प्रहार क्या होगा? इन आरोपों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
कप्तान का प्रहार या मातहतों का कथित बचाव कवच?
एक तरफ पुलिस कप्तान नशे के सौदागरों और अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाकर कार्रवाई का संदेश दे रहे हैं, वहीं कोटा थाने से जुड़ी शिकायतें इस अभियान की जमीनी हकीकत पर सवाल खड़े कर रही हैं। कप्तान साहब अपराधियों पर शिकंजा कसने में जुटे हैं और इधर उनके ही अधीनस्थ थाने की कार्यशैली पर उंगलियां उठ रही हैं।
अब सवाल यह है कि कोटा में कानून का राज चलेगा या कथित चढ़ावे का दरबार? आखिर इन शिकायतों की जांच कौन करेगा? क्या वरिष्ठ अधिकारी कोटा थाने की गतिविधियों की गोपनीय जांच कराएंगे या फिर शिकायतें भी थाने की चारदीवारी में ही दम तोड़ देंगी?
बहरहाल, आरोपों को सच मान लेना उचित नहीं, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना भी समझदारी नहीं होगी, जरूरत है निष्पक्ष जांच, अवैध कारोबार पर ठोस कार्रवाई और पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय करने की, क्योंकि वर्दी की कीमत जनता के भरोसे से है, किसी कथित चढ़ावे से नहीं।
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