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सीपत पुलिस को खबर थी, फिर भी नशे का खेल चलता रहा! एसीसीयू ने पहुंचकर खोल दी ‘गोलियों’ की दुकान...


बिलासपुर 12 सितंबर 2026। बिलासपुर सीपत पुलिस की मुस्तैदी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में नशे की गोलियों की बिक्री की खबर कथित तौर पर थाने के सिपाही से लेकर टीआई स्तर तक पहुंची, मुखबिर ने हुलिया, ठिकाना और समय तक बता दिया, लेकिन कार्रवाई की बारी आई तो शायद जिम्मेदारों की ‘व्यस्तता’ आड़े आ गई,आखिरकार मामला एसीसीयू तक पहुंचा और टीम ने दबिश देकर ऐसा नशे का जखीरा पकड़ा कि सीपत पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए,ग्राम गुड़ी के लोनिया पारा में एसीसीयू और सीपत पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में मुकेश लोनिया (20) के घर से 4,750 नग प्रतिबंधित नशीली गोलियां बरामद की गईं,पुलिस के मुताबिक बरामद प्रॉक्सीवॉन स्पास और अल्प्राजोलम टैबलेट की कीमत करीब 20 लाख रुपये है और वजन लगभग 2.5 किलोग्राम बताया गया है।

पुलिस के अनुसार मुकेश कुछ समय पहले मजदूरी के लिए उत्तर प्रदेश गया था। वहां कथित तौर पर उसकी पहचान नशे के कारोबारियों से हुई और गांव लौटने के बाद मजदूरी की जगह उसने नशीली गोलियों के कारोबार को कमाई का जरिया बना लिया, इस धंधे में उसका 60 वर्षीय पिता उत्तम लोनिया और रिश्तेदार परमेश्वर लोनिया उर्फ कौदा भी कथित रूप से साझेदार बन गए थे।

मुखबिर ने सब बता दिया, फिर भी ‘एक्शन’ का इंतजार!

सूत्रों के अनुसार मामले का सबसे दिलचस्प पहलू सीपत पुलिस की कथित कार्यशैली को लेकर सामने आया है। बताया जा रहा है कि मुखबिर ने स्थानीय पुलिस को आरोपी का हुलिया, लोकेशन और समय तक उपलब्ध कराया था। इसके बावजूद कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी,जब स्थानीय स्तर पर कथित तौर पर बात नहीं बनी तो मुखबिर ने एसीसीयू प्रभारी गोपाल सतपथी से संपर्क किया,इसके बाद एसीसीयू टीम ने सूचना को गंभीरता से लिया और ग्राम गुड़ी में दबिश देकर नशे के इस कथित कारोबार का पर्दाफाश कर दिया, यानी जिस सूचना पर स्थानीय पुलिस को दौड़ना था, उसी सूचना पर एसीसीयू ने पहुंचकर ‘दुकान’ ही बंद करा दी,मामले में तीनों आरोपियों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 21(C), 22(C) और 29 के तहत अपराध दर्ज किया गया है। पुलिस के मुताबिक मुकेश पहले भी एनडीपीएस एक्ट के मामले में जेल जा चुका है। अब नशीली गोलियों की सप्लाई चेन और अवैध कमाई से जुड़ी संपत्ति की जांच की जा रही है।
सवाल सीधा है,जब सूचना थाने की चौखट तक पहुंच चुकी थी, तो कार्रवाई एसीसीयू के आने तक क्यों टलती रही? अगर एसीसीयू भी इंतजार करती रहती, तो शायद 20 लाख की ‘गोलियों की दुकान’ कुछ और दिन आराम से चलती रहती।

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